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Showing posts with the label THE FAMOUS BATTLES

जब एक तीतर पक्षी को बचाने के लिए सैंकड़ो सोढा-परमार राजपूतो ने अपने जीवन का बलिदान दे दिया

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जब एक तीतर पक्षी को बचाने के लिए सोढा-परमार राजपूतो ने अपने जीवन का बलिदान दे दिया...!!! एक ऐसी अनोखी घटना जिसमे एक क्षत्राणी अपने वीर पुत्र की चिता के साथ सती हुई। “शरणे आयो सोपे नहीं राजपुतारी रीत, धड गिरे पर छोड़े नहीं खत्री होय खचित” अंग पोरस, रसणे अमृत, भुज परचो रजभार  सोढा वण सूजे नहीं होय नवड दातार...|| १ || (सोढा-परमार राजपूतो के हाथ से जो दान मिलता हे, उनकी जीभ से जो अमृत बरसता हे और उनकी भुजाओ में जो ताकत होती हे वैसे और किसी में नहीं होता) बात हे विक्रम सवंत 1214 की जब सिंध के थरपारकर में सतत सात साल तक बारिश न होने की वजह से अकाल की स्थिति पैदा हो गई थी जिसकी वजह से वहा के परमार राजा रतनसिंह के बेटे लखधीरसिंह अपनी प्रजा और गोचर के साथ पानी की खोज में सौराष्ट्र के वढवान रियासत में मुली गाव के पास आकर रुके | वहा के उस समय के राजवी विशणदेव वाघेला थे | लखधीरसिंह ने उनसे यहाँ पे रुकने के लिए और अपनी गायो के लिए घास चराने की मांग की, विशणदेव वाघेला अति उदार मन के होने के कारण उन्होंने गायो को चराने के साथ साथ वहा आजू-बाजु की सभी ज़मीन उनको रहेने के लिए दे दी |     ...

1857 की क्रांति में साठा-चौरासी के राजपूतो का संघर्ष- भाग 2***

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ठाकुर गुलाब सिंह तोमर और बागी सपनावत Rajputana Soch राजपूताना सोच और क्षत्रिय इतिहास # ‪#‎ अंग्रेज़ो‬  के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम में राजपूतो का योगदान भाग-5## ***1857 की क्रांति में साठा-चौरासी के राजपूतो का संघर्ष- भाग 2*** === ठाकुर गुलाब सिंह तोमर और बागी सपनावत === मित्रो पिछली पोस्ट में हमने साठा चौरासी क्षेत्र के धौलाना के राजपूतो के बलिदान के बारे में बताया था। इसके दुसरे भाग में आज हम मुकीमपुर गढ़ी के ठाकुर गुलाब सिंह तोमर और बागी गाँव सपनावत के बारे में बताएंगे। ~~मुकीमपुर गढ़ी के ठाकुर गुलाब सिंह तोमर~~ साठा चौरासी का मुकीमपुर गढ़ी गाँव पिलखुवा के निकट अवस्थित है जो कि तोमर राजपूतो का गाँव है। यहाँ के ठाकुर गुलाब सिंह तोमर बहुत बड़े जमींदार हुआ करते थे और उनका स्थानीय जनता में बहुत प्रभाव और मान सम्मान था। 1858 के विप्लव की शुरुआत के बाद क्षेत्र के राजपूत ग्रामीणों ने भी जमींदार गुलाब सिंह तोमर के नेतृत्व में बगावत कर दी। ठाकुर गुलाब सिंह ने ब्रितानियों को लगान न देने एवं क्रांतिकारियों का साथ देने का निश्चय किया। उन्होंने क्षेत्र वासियों को भी लगान न देने के लिए प्रेरित ...

1857 की क्रांति में उत्तर प्रदेश की साठा-चौरासी के राजपूतो का संघर्ष भाग-1

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लाल किले पर केसरिया फहराने वाले राजपूत Rajputana Soch राजपूताना सोच और क्षत्रिय इतिहास ===अंग्रेज़ो के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम में राजपूतो का योगदान- भाग-4 === ****1857 की क्रांति में साठा-चौरासी के राजपूतो का संघर्ष भाग-1*** ~~लाल किले पर केसरिया फहराने वाले राजपूत~~ ****1857 की क्रांति में साठा-चौरासी के राजपूतो का संघर्ष भाग-1*** (edited on date 02-09-2015) पिछले 4 दिन से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दादरी के पास बिसाहदा गाँव में गौ हत्या का मामला देश भर में सुर्खिया बन रहा है। हालाकि इस मामले में अब मीडिया के झूठ और सरकार के पक्षपात पूर्ण रवैय्ये की वजह से मामले को दूसरा रूप दे दिया गया है। यह बिसाहदा गाँव क्षत्रियों के मशहूर साठा चौरासी क्षेत्र का हिस्सा है। इस घटना को लेकर पूरे क्षेत्र में बवाल के हालात हैँ। यहाँ के क्षत्रिय पुलिस से भिड़ने को तैयार हैँ और कई जगह भिड़ंत हो चुकी है। दरअसल सरकारी दमन का डट कर विरोध करने का इस क्षेत्र का इतिहास रहा है। 1857 के संग्राम में भी यहां के क्षत्रियो ने अंग्रेजो के विरुद्ध बढ़ चढ़ कर भाग लिया था। इन क्षत्रियो में गौ रक्षा को लेकर कितना आग्रह है य...

1857 की क्रांति के महानायक कुंवर सिंह की महागाथा (VEER KUNVAR SINGH,THE GREATEST FREEDOM FIGHTER)

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VEER KUNVAR SINGH,THE GREATEST FREEDOM FIGHTER Rajputana Soch राजपूताना सोच और क्षत्रिय इतिहास ===अंग्रेज़ो विरुद्ध स्वाधीनता संग्राम में राजपूतो का योगदान- भाग-3 === मित्रो जैसा कि सभी को पता है कि 1857 के संग्राम में राजपूत अंग्रेज़ो के विरुद्ध संघर्ष में सबसे आगे रहे थे। हमेशा की तरह राजपूतो ने इस संग्राम का नेतृत्व किया था। 1857 का संग्राम, सबसे पहले मुख्यत: एक सैनिक विद्रोह था जिसमे अधिकतर अवध, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के राजपूत सैनिक शामिल थे। इन सैनिको से प्रेरणा लेकर ही इन क्षेत्रो में आम जनता ने अंग्रेज़ो के विरुद्ध बगावत करी। अवध में तो ये बगावत सबसे भीषण थी और समाज के लगभग हर वर्ग ने संग्राम में भाग लिया जिसका नेतृत्व राजपूतो ने किया। अवध, पूर्वांचल और पश्चिम बिहार के राजपूतो ने संग्राम में सबसे सक्रीय रूप से भाग लिया जिसके परिणाम स्वरुप संघर्ष समाप्ति के बाद अंग्रेज़ो ने उनका दमन किया। सिर्फ अवध में ही एक साल के अंदर राजपूतो की 1783 किलों/गढ़ियों को ध्वस्त किया गया जिनमे से 693 तोप, लगभग 2 लाख बंदूके, लगभग 7 लाख तलवारे, 50 हजार भाले और लगभग साढ़े 6 लाख अन्य तरह के हथियारों क...

सतीत्व की अनूठी मिशाल रानी पद्मिनी और गोरा बादल की वीरता

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🚩चित्तौड़ की महारानी पद्मनी  त्याग,सतीत्व,प्रेरणा,जौहर और वीरता की अनुपम मिशाल .... समय 13वीं ईस्वी जब चित्तौड़गढ़ लगातार तुर्को के हमले झेल रहा था बाप्पा रावल के वंशजो ने हिंदुस्तान को लगातार तुर्को और मुस्लिम आक्रांताओ को रोके रखा चित्तोड़ के रावल समर सिंह के बाद उनके बेटे रतन सिंह का अधिकार हुआ उनका विवाह रानी पद्धमणि से हुयी जो जालोर के चौहान वंश से थी (कुछ उन्हें सिंहल द्विव कुछ जैसलमेर के पूंगल की भाटी रानी भी बताते है) उस वक़्त जालोरऔर मेवाड़ की कीर्ति पुरे भारत में थे रतन सिंह जी की पत्नी पद्मनी अत्यंत सुन्दर थी इसी वजह से उनकी ख्याति दूर दूर फ़ैल गयी इसी वजह दिल्ली का तत्कालीन बादशाह अल्लाउद्दीन ख़िलजी रानी पद्मनी की और आकर्षित होकर रानी को पाने की लालसा से चित्तोर चला आया और रानी पद्मणि को अपनी रानी बनाने की ठानी अल्लाउद्दीन ख़िलजी की सेना ने चितौड़ के किले को कई महीनों घेरे रखा पर चितौड़ की रक्षार्थ तैनात राजपूत सैनिको के अदम्य साहस व वीरता के चलते कई महीनों की घेरा बंदी व युद्ध के बावजूद वह चितौड़ के किले में घुस नहीं पाया | अंत अल्लाउद्दीन ख़िलजी ने थक हार कर एक योजना बनाई जिसम...

JADEJA RAJPUTS AND THE BATTLE OF TAMACHAN(सम्वत 1639)

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जाम सत्रसाल उर्फ़ सता जी और तमाचन का युद्ध  Rajputana Soch राजपूताना सोच और क्षत्रिय इतिहास जाम सत्रसाल उर्फ़ सता जी  -------जाम सत्रसाल उर्फ़ सता जी और तमाचन का युद्ध(सम्वत 1639)--------- हमने  देखा की कैसे मजेवड़ी के मैदान में सम्वत 1633 में जाडेजा राजपुतो ने भान जी दल जाडेजा और जैसा जी वजीर के नेत्रत्व में मुग़ल लश्कर को पस्त कर दिया था | भान जी दाल जडेजा ने मजेवाड़ी में अकबर के शिविर से 52 हाथी, 3530 घोड़े और पालकियों को अपने कब्जे में लिया   था और मुगल सेनापति मिर्जा खान तथा अकबर सौराष्ट्र से भाग खड़े हुए थे.  सरदार मिर्ज़ा खान ने अहमदाबाद जाकर सूबेदार शाहबुदीन अहमद खान को बताया की किस तरह जाम साहिब की फ़ौज ने उनके लश्कर का बुरी तरह नाश कर दिया और वो अपनी जान बचाकर वहा से भाग निकला | खुद अकबर भी इस हार से बहुत नाराज था | अब मुगल सेना नवानगर को नष्ट करने के प्रयोजन पर लग गई और जल्दी ही कुछ वर्ष बाद सम्वत 1639 में शाहबुदीन ने खुरम नामके सरदार को एक प्रचंड सैन्य के साथ जामनगर पर चढाई करने के लिए भेजा | मुग़ल सूबे का बड़ा लश्कर जामनगर(नवानगर) के ऊपर आक्रमण करने के लिए आ रह...

JADEJA RAJPUTS AND THE HISTORICAL BATTLE OF BHUCHAR MORI (भूचर-मोरी का ऐतिहासिक युद्ध सम्वत 1648)

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भूचर मोरी का ऐतिहासिक युद्ध Rajputana Soch राजपूताना सोच और क्षत्रिय इतिहास जाडेजा राजपूतों की शौर्यगाथा का प्रतीक भूचर-मोरी का ऐतिहासिक युद्ध (सम्वंत 1648)--------------- राजपूत एक वीर स्वाभिमानी और बलिदानी कौम जिनकी वीरता के दुश्मन भी कायल थे, जिनके जीते जी दुश्मन राजपूत राज्यो की प्रजा को छु तक नही पाये अपने रक्त से मातृभूमि को लाल करने वाले जिनके सिर कटने पर भी धड़ लड़ लड़ कर झुंझार हो गए। आज हम आपको एक ऐसे युद्ध के बारे में बताएँगे जहा क्षात्र-धर्म का पालन करते हुए एक शरणार्थी मुस्लिम को दिए हुए अपने वचन के कारण हजारो राजपुतो ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए | भूचर-मोरी का युद्ध सौराष्ट्र के इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध माना जाता हे ,जहा पश्चिम के पादशाह का बिरुद मिलने वाले जामनगर के शासक और जाडेजा राजपुत राजवी जाम श्री सताजी से अपने से कई गुना अधिक बड़े और शक्तिशाली मुग़ल रियासत के सामने नहीं झुके | यह युद्ध इतना भयंकर था की इसे सौराष्ट्र का पानीपत भी कहा जाता है |इस युद्ध में दोनों पक्षों के एक लाख से ज्यादा सैनिक शहीद हुए. युद्ध की पृष्ठभूमि----- विक्रम सवंत १६२९ में दिल्ही के मुग़ल बादशाह ...